कांग्रेस के शीर्ष लीडर और समाजवादी पार्टी के कुछ नेताओं की मेहनत आखिरकार रंग तो लायी लेकिन ये गठबंधन सिर्फ एक दिमागी खेल है और इसमें अपनेपन या एक दूसरे को साथ लेकर चलने वाली कोई बात दिखाई नहीं देती है। गौरतलब है कि उत्तर प्रदेश की राजनीति को कैश करने के लिए दोनों ही पार्टियां अपनी-अपनी शर्तो पर टिकी हुई थी और क्यों कि कमान स्वयं राहुल और प्रियंका के हाथ में थी तो राजब्बर, गुलाम नबी आज़ाद और शीला दीक्षित सरीखे लोग चाहने के बावजूद खुलकर नहीं बोल पा रहे थे। ऐसे में बिहार में जदयू और रालोद के गठबंधन को दोहराया तो गया लेकिन उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी और कांग्रेस के बीच बिहार जैसा गठबंधन नहीं हुआ, जिसमें दिल और दिमाग दोनों मिले थे। बल्कि जो गठबंधन हुआ उसमें सिर्फ दिमाग का इस्तेमाल करके सीटों का बंटवारा किया गया है। इसलिए जमीन पर इसके बिहार जैसे अमल पर खुद कांग्रेसी भी आशंका जता रहे हैं। उधर भाजपा के रणनीतिकारों ने भी पर्दे के पीछे भरपूर कोशिश की कि उत्तर प्रदेश में बिहार जैसा सपा-कांग्रेस-रालोद का महागठबंधन न बने। आखिर में कांग्रेस के सुपर रणनीतिकार अहमद पटेल ने सारी कमान अपने हाथ में लेकर सीट बंटवारा करवा ही दिया। फिर भी रालोद इससे बाहर रह गया।
सपा-कांग्रेस के बीच इस समझौते से कांग्रेस के कई बड़े नेता और कार्यकर्ता मायूस हैं और भारी मन से इसे स्वीकार कर रहे हैं। पार्टी के एक वरिष्ठ नेता ने नाम न छापने की शर्त पर कहा कि राहुल और प्रियंका गांधी के इतने अपमान के बाद हुए इस समझौते को कार्यकर्ता जमीन पर कैसे उतारेंगे।
बताया जाता है कि महागठबंधन रोकने के लिए भाजपा के रणनीतिकारों ने पहले रालोद को गठबंधन के दायरे से बाहर निकलवाया, जिससे कांग्रेस का दबाव कमजोर हुआ और जब शनिवार को मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने कांग्रेस के दूतों प्रशांत किशोर और धीरज श्रीवास्तव को बैरंग लौटाया तो गठबंधन टूटने की इबारत लिख गई। इसे लेकर कांग्रेस कार्यकर्ता तो खुश थे, लेकिन शीर्ष नेतृत्व और उन रणनीतिकारों के चेहरों पर मायूसी छा गई, जिन्होंने उत्तर प्रदेश में संघर्ष और मेहनत की बजाय सपा-कांग्रेस गठबंधन की शार्टकट लाइन ली थी।