(वसी ज़ैदी )
एक दिन हम नदियों के किनारे आते हैं। शांत मद्धम बहता हुआ वो नीला-हरा पानी लुभाता है। अपने करीब और बहुत करीब हमें बसाता है और फिर एक दिन नदी अपना रूप बदलती है और वो शांत मद्धम बहता हुआ नीला-हरा पानी भयानक सैलाब बन जाता है। वो सैलाब अपने साथ सारी बसावट बहा ले जाता है। सड़कें, घर, पुल और जिंदगी उसके आगोश में समा जाती है और पीछे रह जाता है, कीचड़, बर्बादी और कभी ना भरने वाला खालीपन। आज नेपाल की आपदा की जो तस्वीरें सामने आती हैं वो तबाही और दर्द के निशां के सिवां कुछ नहीं हैं। वो सैलाब हमें अहसास करा रहा है कि इंसान की सारी तरक्की, सारी तकनीक और सारी ताकत कितनी छोटी हैं।
दरअसल हिमालय जितना सुंदर है उतना ही संवेदनशील भी है। साल दर साल नेपाल हो या भारत हिमालयी क्षेत्र के पूरे भूभाग में भूकंप, भूस्खलन, बादल फटने और अचानक आने वाली बाढ़ जैसी आपदाओं में तेजी आयी है। नदियों के किनारे बढ़ती बसावट, जलवायु परिवर्तन, ग्लैशियर का कमजोर होना कई वैज्ञानिक दृष्टिकोण हो हैं लेकिन मेरा मानना है कि उससे कहीं ज्यादा हमारी नासमझी है। हम हिमालय को समझ ही नहीं पाये हैं। आपदा आती हैं और कुछ ही दिनों में हम भूल जाते हैं और पुराने ढर्रे पर लौट जाते हैं। विकास और पर्यावरण का क्या संतुलन होना चाहिए हम जानते ही नहीं हैं। हम खूबसूरत प्रकृति का आनंद लेने में इतने खो जाते हैं कि सीमा पार कर देते हैं और एक दिन ऐसा आता है कि प्रकृति नाराज हो जाती है, रोद्र हो जाती है और अहसास करा देती है कि ये सीमा थी, इससे आगे नहीं बढ़ना था। ये हमारी नासमझी है कि हम उस चेतावनी को नहीं समझ पाते हैं।
मेरा मानना है कि हिमालय को जीतने की नहीं, समझने की जरूरत है। पहाड़ में विकास जरूरी है। सड़कें, पुल, पर्यटन और रोजगार सब जरूरी है। लेकिन विकास ऐसा हो जो पहाड़ को साथ लेकर चले। एक पैमाना तय हो, एक सीमा तय हो, सुरक्षा के मानक तय हो और आपदा में रिस्पांस टाइम भी तय हो। नेपाल में आई आपदा को केवल एक प्राकृतिक त्रासदी मानकर भूल जाना सबसे बड़ी भूल होगी। हमें सीखना होगा कि हर आपदा अपने पीछे एक सबक छोड़ती है। ये हमारी भूल है कि हम अक्सर आपदा के समय जागते हैं और खतरा गुजरते ही फिर सो जाते हैं। जब पानी घरों में घुसता है तब हमें नदियां याद आती हैं। जब पहाड़ टूटता है तब हमें जंगल याद आते हैं। जब पुल बहता है तब हमें निर्माण की गुणवत्ता याद आती है और जान दांव पर लगती है तो हमें आपदा प्रबंधन याद आता है।
इन सबसे ज्यादा हमें स्वयं संवेदनशील होने की आवश्यकता है। सुदूर गांवों की चैपाल तक स्थानीय लोगों को प्रशिक्षित करना होगा। समय रहते चेतावनी पहुंचानी होगी। सुरक्षित स्थानों की पहचान करनी होगी। स्कूलों और गांवों में नियमित आपदा अभ्यास होना चाहिए। राहत सामग्री संवेदनशील क्षेत्रों के आसपास उपलब्ध होनी चाहिए। हमें यह भी समझना होगा कि जलवायु परिवर्तन ने चुनौती को और गंभीर बना दिया है। मौसम का मिजाज बदल रहा है। बारिश के पैटर्न में बदलाव दिखाई दे रहा है। कहीं अत्यधिक वर्षा तो कहीं लंबे सूखे की स्थिति बन रही है। हिमालय जैसे नाजुक क्षेत्र में इन बदलावों का असर और गहरा हो रहा है। कई ऐसी झील हैं जो आपदा के मुहाने पर हैं। रैंणी, धराली, केदारनाथ, कश्मीर, नेपाल और सैकड़ों क्षेत्र इन दर्द से रूबरू हो चुके हैं, आगे ऐसी घटनाएं ना हो ऐसा हमें प्रयास करना होगा। साथ ही इंसानियत को भी जिंदा रखना होगा। नेपाल आपदा के बाद कुछ तस्वीरें ऐसी आयी जो विचलित करने वाली थी। लोग मृतकों के शरीर से सोना नोच रहे थे। बहुत वीभत्स करने वाली वीडियो थी। क्या मानवता का कोई मोल नहीं है। क्या इंसान इतना गिर चुका है कि इंसान के मरने-जीने से कोई प्रभाव ना पड़ता हो। आंखों में आंसू आने के लिए किसी अपने की तकलीफ ही मायने रखती है क्या। हजारों लोग अपने लोगों की तलाश में नदी के उतरते सैलाब के मुहाने पर खड़े हैं। उम्मीदें बुझ चुकी है लेकिन आंखों में आज भी इंतेजार है। सैकड़ों लोग मर चुके हैं। मार्चरी में जगह नहीं है। हजारों लोग लापता है, यदि ऐसी में भी हम में इंसानियत ना जगे तो माफ कीजियेगा हमें इंसान कहलाने का कोई हक नहीं है। सैलाब आते हैं चले जाते हैं लेकिन पीछे जो दर्द के निशां छोड़ जाते हैं हमें उन निशां से सबक सीखना होगा। यदि इंसानियत का भी तकाजा है और जिम्मेदार नागरिक का भी।