(मौ. वसी ज़ैदी)
भारतीय जनता पार्टी ने 17 अगस्त 2026 को राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नबीन के नेतृत्व में अपनी नई केंद्रीय टीम बनायी है। देशभर में युवा आंदोलन के बीच, आगामी चुनाव को देखते हुए और भाजपा को फिर वहीं संगठनात्मक मजबूती देने के लिए ये कवायद और उर्जा कितनी कारगर साबित होगी ये देखने वाली बात होगी लेकिन नई टीम में अनुभव और युवा चेहरों का मिश्रण है, पुराने दिग्गजों की वापसी है और कई ऐसे नेताओं को महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां दी गई हैं, जिनके जरिए भाजपा अलग-अलग राज्यों, सामाजिक समूहों और राजनीतिक क्षेत्रों में अपनी पकड़ मजबूत करना चाहती है।
यह बदलाव ऐसे समय हुआ है जब भाजपा के सामने केवल चुनाव जीतने की चुनौती नहीं है, बल्कि सत्ता में रहते हुए संगठन को लगातार सक्रिय बनाए रखने, नई पीढ़ी को नेतृत्व में आगे लाने और डिजिटल युग की बदलती राजनीतिक भाषा के साथ कदमताल करने की भी चुनौती है। इस चुनौती के चलते पूर्व राजस्थान मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे सिंधिया, पूर्व उत्तराखंड मुख्यमंत्री तीरथ सिंह रावत, राम माधव, बैजयंत पांडा और मनप्रीत सिंह बादल जैसे नेताओं को राष्ट्रीय उपाध्यक्ष की जिम्मेदारी दी गई है। वहीं स्मृति ईरानी की राष्ट्रीय महामंत्री के रूप में वापसी विशेष राजनीतिक महत्व रखती है। स्मृति ईरानी की वापसी को महज संगठनात्मक नियुक्ति मानना पर्याप्त नहीं होगा। वे लंबे समय से भाजपा की आक्रामक राजनीतिक शैली, महिला नेतृत्व और उत्तर प्रदेश की राजनीति में पार्टी के प्रमुख चेहरों में रही हैं।

इसी तरह राम माधव की वापसी भी महत्वपूर्ण संकेत देती है। संगठन, विचारधारा और पूर्वोत्तर की राजनीति में उनकी भूमिका लंबे समय तक महत्वपूर्ण रही है। उन्हें राष्ट्रीय उपाध्यक्ष बनाना इस बात का संकेत हो सकता है कि भाजपा अपने केंद्रीय संगठन में ऐसे अनुभवी नेताओं को फिर से सक्रिय भूमिका देना चाहती है, जिनके पास संगठनात्मक प्रबंधन और राजनीतिक रणनीति का अनुभव है।
उत्तराखंड के पूर्व मुख्यमंत्री तीरथ सिंह रावत को राष्ट्रीय उपाध्यक्ष बनाया जाना उत्तराखंड की दृष्टि से भी महत्वपूर्ण है। तीरथ सिंह रावत लंबे समय से भाजपा संगठन से जुड़े रहे हैं और लोकसभा सांसद तथा मुख्यमंत्री सहित विभिन्न जिम्मेदारियां संभाल चुके हैं। उनकी नई जिम्मेदारी केवल उत्तराखंड तक सीमित नहीं मानी जानी चाहिए। राष्ट्रीय उपाध्यक्ष के रूप में उनके सामने देश के अलग-अलग राज्यों में संगठनात्मक काम, कार्यकर्ताओं से संवाद और पार्टी की राजनीतिक रणनीति को जमीन तक पहुंचाने जैसी जिम्मेदारियां हो सकती हैं।
नई टीम में केंद्रीय मंत्री पियूष गोयल को राष्ट्रीय कोषाध्यक्ष की जिम्मेदारी दी गई है। संगठन के वित्तीय प्रबंधन की जिम्मेदारी किसी ऐसे नेता को देना, जो सरकार और आर्थिक नीति से गहराई से जुड़ा रहा हो, भाजपा की संगठनात्मक प्राथमिकताओं का एक संकेत माना जा सकता है।
भाजपा ने बी.एल. संतोष को राष्ट्रीय संगठन महामंत्री के पद पर बनाए रखा है। यह निर्णय निरंतरता का संकेत है। जहां एक ओर नई टीम में व्यापक बदलाव किया गया, वहीं संगठन के केंद्रीय संचालन के एक महत्वपूर्ण स्तंभ को बनाए रखा गया है। राष्ट्रीय स्तर तक कार्यकर्ताओं के नेटवर्क को सक्रिय रखना, विभिन्न राज्यों की इकाइयों के बीच समन्वय करना और चुनावी रणनीति को जमीन पर लागू करना संगठन महामंत्री की भूमिका का महत्वपूर्ण हिस्सा होता है।
नई टीम में डिजिटल और सोशल मीडिया संगठन में भी बदलाव किया गया है। अमित मालवीय लंबे समय से भाजपा के डिजिटल और आईटी तंत्र के प्रमुख चेहरों में रहे हैं। नई घोषणा में दीपक म्हास्के को सोशल मीडिया संयोजक की जिम्मेदारी दी गई है, जबकि प्रीति गांधी, शिवानंद द्विवेदी, आलोक भट्ट और अरुण यादव को सह-संयोजक बनाया गया है। मीडिया रणनीति की जिम्मेदारी अनिल बलूनी को दी गई है।
राजनीति में पद मिलना उपलब्धि का अंत नहीं, बल्कि जिम्मेदारी की शुरुआत है। भाजपा आज देश की सबसे शक्तिशाली राजनीतिक पार्टियों में है। ऐसे संगठन के सामने जनता की अपेक्षाएं भी अधिक हैं। पहली परीक्षा संगठन की होगी। क्या नए पदाधिकारी कार्यकर्ताओं के साथ नियमित संवाद स्थापित कर पाएंगे? क्या केंद्रीय नेतृत्व और राज्य इकाइयों के बीच मतभेदों को समय रहते सुलझाया जा सकेगा?
दूसरी परीक्षा चुनाव की होगी। आने वाले विधानसभा चुनाव भाजपा के लिए संगठनात्मक प्रयोग की पहली बड़ी परीक्षा बनेंगे। टिकट वितरण, स्थानीय नेतृत्व, गठबंधन, सामाजिक समीकरण और बूथ प्रबंधन इन सभी मोर्चों पर नई टीम की क्षमता सामने आएगी।