आज जब देश तेजी से विकास की ओर बढ़ रहा है तो ये जरूरी हो जाता है कि विकास की इस यात्रा में आधी आबादी की भी बराबर भागीदारी हो। ये जरूरी हो जाता है कि समानता, न्याय और समावेश की बातें किताबी ना हो धरातल पर भी दिखायी दे। महिला आरक्षण संशोधन बिल इसी दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है, जो बेहतर है वो और बेहतर हो सकता है और भारत में जो विश्व का सबसे बड़ा लोकतांत्रिक देश है, वहां ये कदम ना सिर्फ आवश्यक है बल्कि जिम्मेदारी भी है। राजनीति एक ऐसा अध्याय है जहां से समाज से चलता है, लोकतंत्र चलता है। इस अध्याय में महिलाओं की बढ़ती भागीदारी सभ्य और सुरक्षित समाज की परिकल्पना की दिशा तय करेगी। हमारा संविधान समानता के सिद्धांत पर आधारित है। संविधान ने महिलाओं और पुरुषों को समान अधिकार प्रदान किए हैं, लेकिन व्यवहारिक स्तर पर यह समानता अभी तक अधूरी है। ऐसे में महिला आरक्षण की बात करना एक नीतिगत फैसला नहीं बल्कि सामाजिक परिवर्तन की एक ऐतिहासिक पहल का पहला कदम है।
16 से 18 अप्रैल तक संसद का विशेष सत्र बुलाया गया है, जिसमें महिला आरक्षण संशोधन बिल को पेश किया जाएगा। इस बिल के जरिए महिलाओं को संसद और विधानसभाओं में 33 फीसदी आरक्षण मिलेगा। दरअसल संसद और विधानसभाओं में महिलाओं को 30 फीसदी आरक्षण देने वाला बिल पास तो तीन साल पहले ही हो गया था लेकिन इस कानून को 2029 के लोकसभा चुनाव से ही लागू करने के लिए और संख्या को 33 फीसदी करने के लिए संशोधित बिल लाया जा रहा है।
ये कहने में कोई दो राय नहीं है कि भारतीय समाज में महिलाओं की स्थिति समय के साथ बदलती रही है। स्वतंत्रता के बाद संविधान में महिलाओं को समान अधिकार दिए, लेकिन राजनीतिक प्रतिनिधित्व के मामले में वे पीछे ही रहीं। 1992-93 में 73वें और 74वें संविधान संशोधन के माध्यम से पंचायत और नगर निकायों में महिलाओं को 33 फीसदी आरक्षण दिया गया। इस कदम ने जमीनी स्तर पर महिलाओं की भागीदारी को बढ़ाया और लाखों महिलाएं पहली बार सत्ता और निर्णय प्रक्रिया का हिस्सा बनीं। यह प्रयोग काफी सफल रहा और इसने यह सिद्ध किया कि यदि अवसर मिले, तो महिलाएं न केवल भागीदारी कर सकती हैं, बल्कि प्रभावी नेतृत्व भी दे सकती हैं। अब सवाल देश की सबसे बड़ी पंचायत का है। महिला आरक्षण विधेयक, जिसे कई वर्षों से लंबित रखा गया था, लोकसभा और राज्य विधानसभाओं में महिलाओं के लिए 33 फीसदी का मांग होती रही है। हालांकि राजनीतिक दलों के बीच मतभेद, सामाजिक समीकरणों की जटिलता और पिछड़े वर्ग पर एक सकारात्मक बहस हो सकती है पर शायद ये हर कोई चाहेगा कि महिलाओं की भागीदारी बढ़े।
हाल के वर्षों में इस विधेयक को लेकर नई पहल और राजनीतिक इच्छाशक्ति देखने को मिली है, महिलायें भी अपनी भागीदारी की भूमिका के दायरे को बढ़ा रही हैं। जागरूक हो रही हैं। मुखर हो रही हैं। एक दृष्टिकोण तय रही हैं। एक नजरिया बना रही है और ये अच्छे संकेत हैं। हाल ही के वर्षों में जब प्रियंका गांधी ने कहा था कि लड़की हूं लड़ सकती हूं तो देशभर में महिला वर्ग ने उनका समर्थन किया था। दरअसल लोकतंत्र में प्रतिनिधित्व का सीधा संबंध नीति निर्माण से होता है। ये मेरा व्यक्तिगत मानना है कि जब किसी वर्ग का पर्याप्त प्रतिनिधित्व नहीं होता, तो उसके मुद्दे भी प्राथमिकता में नहीं आते। भारत की संसद और विधानसभाओं में महिलाओं की संख्या अभी भी काफी कम है, अब निर्णय सकारात्मक हो या इग्नोर किया जाये पर महिलाओं की आवाज निर्णय प्रक्रिया में पूरी तरह से शामिल नहीं है।

आज जरूरत है कि महिला आरक्षण के माध्यम से यह भी सुनिश्चित किया जाये कि महिलाओं की भागीदारी बढ़े और वे अपने अनुभवों और दृष्टिकोण के आधार पर नीतियों को प्रभावित कर सकें। इससे शिक्षा, स्वास्थ्य, पोषण, सुरक्षा, लैंगिक हिंसा, और रोजगार जैसे मुद्दों पर अधिक संवेदनशील और प्रभावी नीतियां बने। ये बदलाव राजनीतिक क्षेत्र तक सीमित ना रहे बल्कि इसका व्यापक सामाजिक असर भी हो। जब महिलाएं नेतृत्व की भूमिका में दिखाई दें, तो समाज में उनके प्रति दृष्टिकोण में सकारात्मक बदलाव आये। ये बदलाव लड़कियों और महिलाओं के लिए प्रेरणा का स्रोत बने। परिवारों में बेटियों की शिक्षा और करियर को लेकर सोच बदले। लैंगिक समानता को बढ़ावा मिले और महिलाओं को आत्मनिर्भर बनने के लिए प्रोत्साहित करे।
लोग कहते हैं कि महिलाओं की भूमिका केवल प्रतीकात्मक प्रतिनिधित्व तक सीमित रहती है। जिसे “प्रॉक्सी राजनीति“ कहते हैं। यानि महिलाएं केवल नाममात्र की प्रतिनिधि हों और वास्तविक निर्णय उनके परिवार के पुरुष सदस्य लें। मेरा व्यक्तिगत मानना है कि इसे पूरी तरह नजरअंदाज तो नहीं किया जा सकता है लेकिन अब वक्त बदला है। महिलायें बढ़-चढ़कर सकारात्मक भूमिकायें निभा रही हैं और बिना किसी सकारात्मक हस्तक्षेप के महिलाओं को समान अवसर मिल पाना कठिन होता है। ये आरक्षण एक प्रारंभिक कदम है, जो समय के साथ सामाजिक बदलाव का मार्ग प्रशस्त करेगा। ये हमारी सामूहिक जिम्मेदारी है कि हम हर उस पहल का समर्थन करें जो महिलाओं को आगे बढ़ाने का मार्ग प्रशस्त करती हों क्योकि जब महिलाएं सशक्त होंगी, तभी समाज और राष्ट्र भी सशक्त होगा।
सौलत जबी, वरिष्ठ पत्रकार