7 अप्रैल मंगलवार को अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ट्वीट करते हैं कि आज रात एक पूरी सभ्यता समाप्त हो जायेगी जो दुबारा वापिस नहीं लायी जा सकेगी। मैं नहीं चाहता हूं कि ऐसा हो लेकिन शायद ऐसा ही होगा। 28 फरवरी से शुरू होकर लगभग 40 दिन चले इस ईरान-इजराइल-अमेरिका युद्ध में ये सबसे बड़ी और अंतिम धमकी थी। दुनियाभर की निगाहें अमेरिका के कदम पर थी। लोग प्रार्थना करने लगे। सड़कों पर उतर गये, टीवी से चिपक गये। हर कोई बेताब था कि शायद एक बड़ी अनहोनी होने वाली है। एशिया में रात गहराने लगी। अचानक पाकिस्तान मध्यस्थता की भूमिका में आता है और डोनाल्ड ट्रंप हर शर्त पर सहमत होते चले जाते हैं। 14 दिन का सीजफायर घोषित हो जाता है और ईरान को बहुत कुछ गंवाने के बाद भी एक सैद्धान्तिक जीत हासिल हो जाती है। ईरान की अडिगता और हिम्मत हठधर्मी डोनाल्ड ट्रंप को पीछे हटने पर मजबूर कर देती है। युद्ध होता है तो ईरान की हिम्मत पर और युद्ध रूकता है तो ईरान की शर्तो पर। ना होर्मुज पर ईरान का कंट्रोल कम हुआ और ना ही अमेरिका के मुताबिक सत्ता परिवर्तन हो सका। आखिर दुनिया की सबसे बड़ी ताकत से ईरान को समझने मे कहां चूक हो गयी। आखिर ऐसा क्या हो गया कि तय समय से कुछ वक्त पहले ट्रंप ईरान की शर्ते मान लेते हैं।

28 फरवरी की सुबह अमेरिका ने ईरान पर ऑपरेशन एपिक फ्यूरी शुरू किया था, उस ऑपरेशन के शुरूआती दौर में ही ईरान ने अपना सर्वोच्च लीडर खो दिया। दुनियाभर में किसी को उम्मीद नहीं थी कि अब ईरान मैदान में टिक सकता है। व्हाइट हाउस को तो यकीन था कि बहुत जल्द उनके हक में फैसला होगा जो वेनेजुएला जैसा तेज, साफ और निर्णायक होगा। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप बहुत उत्साहित थे कि ईरान झुक जाएगा, लेकिन 40 दिन तक हजारो हमले झेलने के बाद भी ईरान झुका नहीं। वो तस्वीर जो व्हाइट हाउस देखना चाहता था वो नजर नहीं आई। बल्कि होर्मुज और गले की फांस बन गया। अमेरिका डबल फंस गया। एक ओर अपनी आवाम डोनाल्ड ट्रंप से नाराज हो गयी दूसरी ओर मित्र देशों ने भी हाथ खींच लिये। इजराइल अमेरिका की ओर देखना लगा और अमेरिका अब क्या करें और कैसे करे इस खींचतान में उलझ गया। ईरान को जितना डराने की कोशिश की जाती, ईरान उतनी ही हिम्मत दिखाता। ये एक अंतहीन युद्ध की भयानक शुरूआत जैसा हो गया। अमेरिकी सेना को एक बेवजह के युद्ध में ढकेलने जैसा था जिसका नतीजा किसी भी सूरत में बेहतर नहीं हो सकता था। आखिरकार वह हुआ, जो किसी ने नहीं सोचा था। ट्रंप ने सभ्यता को मिटाने की धमकी वापस ली और 14 दिन का संघर्षविराम स्वीकार कर लिया। इस जंग में ईरान को बहुत नुकसान हुआ लेकिन हिम्मत और जज्बे की पूरी दुनिया में तारीफ हुई। इस जंग के बाद भी ईरान ने लेबनान को अकेला नहीं छोड़ा और इजराइल को भी सीजफायर करना पड़ा।
इस युद्धविराम की सबसे बड़ी होर्मुज ही रहा है। होर्मुज में ईरानी गतिरोध की वजह से अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतें लगातार बढ़ रही थीं। खाड़ी के कई देश अमेरिका के इस युद्ध में फंस गये थे। ट्रंप के सामने दो ही रास्ते थे। या तो ईरान की शर्तो को माना जाये या ईरान के उस 600 किमी हिस्से पर कंट्रोल किया जाये जहां से होर्मुज के रास्ते खुले। अमेरिकी सेना होर्मुज जलडमरूमध्य पर जल्दी नियंत्रण नहीं कर सकती थी, इसे कंट्रोल में करने और फिर उस कंट्रोल को बनाये रखने में दशक बीत जाते। अमेरिका के लिए ये आसान नहीं था। अमेरिका इज्जत के साथ मध्यस्थता के रास्ते तलाशने लगा। ऐसे में वो सभ्यता मिटाने वाला ट्वीट और फिर पाकिस्तान की मध्यस्थता ये रास्ता प्लॉन किया गया होगा और इस तरह अमेरिका किसी तरह इस झंझट से बाहर निकल पाया।
इस युद्ध में ईरान ने अपनी ताकत खूब दिखायी। ईरान ने ये साबित किया कि वह हजारों हमले झेलकर भी एक असरदार युद्ध लड़ सकता है। दुनियाभर की तेल आपूर्ति बाधित कर सकता है और अमेरिका जैसे ताकतवर को झुका सकता है। ईरान ने इजराइल और खाड़ी देशों में अमेरिकी ठिकानों पर मिसाइल और ड्रोन हमलों की झड़ी लगा दी। लोग इस इंतेजार में रहे कि ये मिसाइलें कितनी तादाद में हैं और कब खत्म होगी पर हफ्तों की बमबारी के बाद भी उसकी मिसाइल क्षमता मजबूत रही। ईरान ने जेट सुसाइड ड्रोन का भी इस्तेमाल किया जो रडार को भी चकमा दे सकता है।
अब ईरान ने अपनी शर्तों में सभी प्रतिबंधों को हटाने की मांग की है। होर्मुज जलडमरूमध्य पर अपना कब्जा जारी रखने का बात कही है। ईरान और उसके सहयोगियों पर हमले पूर्ण रूप से बंद करने की भी मांग की है और इन सभी शर्तो को अमेरिका को मानना पड़ा है।
अब दो हफ्ते के संघर्षविराम की योजना के बाद ईरान और ओमान को होर्मुज से गुजरने वाले जहाजों से ईरान शुल्क वसूल सकता है और शायद इसी पैसे से ईरान पुनर्निर्माण की शुरूआत करेगा। होर्मुज ओमान और ईरान दोनों के समुद्री क्षेत्र में है। यानि ईरान का दबदबा इस जलमार्ग पर कायम रहेगा। इस युद्ध रूकने के बाद तेल की कीमतें फिलहाल थोड़ी सी गिरी हैं लेकिन बहुत कुछ आगामी शांति वार्ता पर निर्भर करेगा। इस युद्ध ने दुनियाभर की इकोनोमी को प्रभावित किया है। ईरान का बिखरा हुआ शासन आने वाले समय में और मजबूत होगा और वो अमेरिका के सामने अब ज्यादा अड़ियल साबित होगा। इस पूरे युद्ध में सऊदी अरब, संयुक्त अरब अमीरात, कुवैत और अन्य खाड़ी मुस्लिम देशों को बड़ा नुकसान हुआ। उनकी आवाम उनसे नाराज रही और अमेरिका से भी क्या हासिल हुआ।
सौलत जबी, वरिष्ठ पत्रकार
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